
समाचार: राष्ट्र, सत्ता और समाज
यदि हम इन तीनों—राष्ट्र, सत्ता और समाज—पर विहंगम दृष्टि डालें, तो पिछले दस वर्षों में भारतवर्ष में अमूल्य परिवर्तन परिलक्षित होते हैं।
यदि राष्ट्र की बात करें, तो कश्मीर, केरल, गोवा, अंडमान, सिक्किम—किसी भी क्षेत्र का नाम लें, वहां की घटनाएं एक आम नागरिक को प्रभावित करती हैं, चाहे वह फैजाबाद, देवरिया, पीलीभीत, भोपाल, मुंबई, चेन्नई या देश के किसी भी कोने में रहता हो। यही जुड़ाव राष्ट्रवाद है।
अब जब राष्ट्र की अवधारणा स्पष्ट हो गई, तो यह भी स्वीकार करना होगा कि समाज बंटा हुआ है, या यूं कहें कि सदियों से बंटा हुआ समाज राष्ट्र के नाम पर एक नहीं हो पाया। समाज में यह विघटन जाति, धर्म, धन और परंपराओं के कारण है। इनकी जड़ें आज नहीं जमीं, बल्कि यह विभाजन राष्ट्र की एकजुटता में सबसे बड़ी बाधा रहा है।
यदि धर्म की बात करें, तो हिंदू-मुसलमान को कितनी भी पूर्वजों की दुहाई दी जाए या एक ही डीएनए की बात कर ली जाए, यह सर्वविदित है कि ये दोनों समुदाय विपरीत ध्रुव हैं। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इनके बीच 800 वर्षों की नफरत लगभग समाप्त हो गई थी, किंतु विभाजन ने इन घावों को फिर से हरा कर दिया।
विभाजन वह घटना थी, जिसके कारण हिंदू चेतना ने मुसलमानों को कभी माफ नहीं किया। 21 लाख लोग मारे गए—इतना बड़ा नरसंहार इस पृथ्वी पर पिछले हजारों वर्षों में नहीं हुआ था। कुछ तो स्वतंत्रता का जश्न था और कुछ नए स्वप्नों की आहट, जिसने इतने बड़े नरसंहार को भुलाने में मदद की।
इसके बाद देश ने नए समाज की परिकल्पना के साथ आगे बढ़ना शुरू किया। शुरुआती सत्ताधारी आदर्शवाद के साथ आगे बढ़े, जो गलत भी नहीं था, किंतु सत्ता के इस आचरण ने शासन को समझौतावादी बना दिया। सेक्युलरिज़्म की नई परिभाषा गढ़ी गई, जो हमारे खून में रची-बसी सहिष्णुता से भिन्न थी।
हम सनातनियों के लिए सेक्युलर शब्द का कोई अनुवाद हमारी किसी भाषा में नहीं है, क्योंकि हमारे डीएनए में ही मानव मात्र का आदर और हर पंथ, हर धर्म, हर मज़हब का सम्मान है। परंतु, पिछले 70-75 वर्षों से हमें एक नए प्रकार का सेक्युलरिज़्म सिखाया गया, जिसमें कहा गया कि भेड़ और भेड़िया समान हैं और सब एक ही घाट पर पानी पिएंगे।
यहां तक तो ठीक था, लेकिन जब भेड़िया भेड़ को खाने का अधिकार मांगने लगे—वह भी इस एहसान के साथ कि “हम इस मुल्क में रुक गए, इसलिए हमें यह अधिकार मिलना चाहिए”—तब समस्या शुरू हुई। जब भेड़ों ने विद्रोह किया, तो इसे समाज के ताने-बाने को तोड़ने वाला कदम कहकर राष्ट्र-विरोधी करार दिया गया।
सह-अस्तित्व गलत नहीं है, लेकिन इसके लिए अपना ही अस्तित्व समाप्त कर देना न्यायोचित नहीं है। यह पूरी दुनिया में भेड़ियों के विरुद्ध जन-जागरण का काल है। यह जागृति दुनिया से हमारे देश में आई या हमारे देश ने दुनिया को एक्सपोर्ट की—यह शोध का विषय है।
यह सदी बहुत महत्वपूर्ण है। भेड़ों के सामने जीने के लिए भेड़ियों से लड़ने की चुनौती है, जिसे भेड़ों ने स्वीकार कर लिया है। यह सदी इतिहास में दर्ज करेगी कि भेड़िए हार गए, मारे गए या सुधर गए—यह देखने वाली बात होगी।
अब रही जाति-पाति की बात, तो अगले 50-60 वर्षों में जाति व्यवस्था वीरगति को प्राप्त हो जाएगी। समाज बदलेगा, अवश्य बदलेगा, हर हाल में बदलेगा।
अब सत्ता की बात करें
मैं अपने एक मित्र की बात दोहराऊंगा।
एक बार मैंने उनसे पूछा था, “लालू यादव ने बिहार को क्या दिया?”
तो उन्होंने जवाब दिया, “पिछड़ों को सम्मान दिया।”
यही बात मौजूदा सत्ता भी कर रही है। उसने कुछ किया हो या न किया हो, किंतु बहुसंख्यकों को 1000 वर्षों के बाद सम्मान तो दिया ही है।
हाँ, घूसखोरी, भ्रष्टाचार और लालफीताशाही अब भी बरकरार है, पर इसके लिए सत्ता को समय दिया जाना चाहिए।
जय हिंद!
राजेश श्रीवास्तव